हरिवंश महापुराण्म् (हिन्दी,संस्कृत) - Harivansha Mahapuran [PDF]
हरिवंश वेदार्थप्रकाशक महाभारत ग्रन्थका ही अन्तिम पर्व है। आदिपर्वके अनुक्रमणिकाध्यायमें महाभारतको सौ पर्वोंवाला ग्रन्थ बतलाया गया है। उसके अन्तिम तीन पर्व इस हरिवंश-ग्रन्थमें ही सम्मिलित हैं। यह बात अनुक्रमणिकाध्यायमें स्पष्टरूपसे निर्दिष्ट है-
हरिवंशस्ततः पर्व पुराणं खिलसंज्ञितम् ।
विष्णुपर्व शिशोश्चर्या विष्णोः कंसवधस्तथा ।।
भविष्यं पर्व चाप्युक्तं खिलेष्वेवाद्भुतं महत् ।
एतत्पर्वशतं पूर्ण व्यासेनोक्तं महात्मना ।।
(महा० आदि०, अध्याय २। ८२-८३)
जैसे वेदविहित सोमयाग उपनिषदोंके बिना साङ्ग सम्पन्न नहीं होता, वैसे ही श्रीमहाभारतका पारायण भी हरिवंश-पारायणके बिना पूर्ण नहीं होता। किंतु हरिवंशका पारायण गीता आदिकी तरह स्वतन्त्र भी किया जाता है। इस तरह यह 'पुराणं खिलसंज्ञितम्' आदिपर्व (२। ८२) के आधारपर 'हरिवंशपुराण' तथा 'हरिवंशपर्व' इन दोनों ही नामोंसे विद्वानोंके बीच विख्यात है।
पुत्रप्राप्तिकी कामनासे हरिवंश-श्रवणकी परम्परा भारतमें चिरकालसे प्रचलित है। विशेषकर यदि जन्मकुण्डलीमें संतानभाव सूर्यके द्वारा दृष्ट, आविष्ट या बाधित हो तो हरिवंश-श्रवण ही उसका प्रतिकार बतलाया गया है-
वंशान्तो हरिरुष्णगौ त्रिपुराहाब्जे भूसुते रुद्रियं सौम्ये सम्पुटकांस्यपात्रविधिवज्जीवे च पित्र्यातिथिः ।
शुक्रे गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युञ्जयः कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलाः संतानसौख्यप्रदाः ।।
(बृहत्पाराशरहोराशास्त्र, पूर्वखण्ड १६। १४७)
श्रवणं हरिवंशस्य कर्तव्यं च यथाविधि ।
जुहुयाच्च दशांशेन दूर्वामाज्यपरिप्लुताम् ।।
(मन्त्रमहार्णव, वृद्धसूर्यार्णव)
यों भी इसके श्रवणकी बहुत महिमा है। जो फल अठारहों पुराणोंके सुननेसे मिलता है, वह अकेले हरिवंशके सुननेसे हो जाता है-
अष्टादशपराणानां श्रवणाद यत्फलं लभेत् ।
तत्फलं समवाप्नोति वैष्णवो नात्र संशयः ॥